ऐनक

ऐनक

धुंधली सड़के धुंधले धब्बे
धुंधले-धुंधले पैरो के निशान
धुंधली चाय धुंधले लोग
धुंधला- धुंधला सारा जहाँ

अपनों से हुई क़ुरबत धुंधली
धुंधली लगने लगी खुद की परछाई
हुई धुंधली हाथो की लकीरे
ये बात हमें कुछ समझ न आयी

जो रोज़ गुज़ारा करते थे
हाथो में लिए अपना सेल फ़ोन
अब मिनट में ही कोई बहाना
हम बनाया करने लगे

वो शाम का सूरज जब तक
धरती को छूके गुज़रता था
हम पढ़ने के सारे काम
कल पे बढ़ाया करने लगे

अब न होती फेसबुक पे गुप्षुप
न ट्विटर की ट्वीट में वक़्त गुज़रता
अब तोह बस घर वालो से
हम यूही बतियाया करते थे

वो हुआ यु की इस साल
ऐनक लग गयी हमे
और हम इज़्तिरार कोस रहे
धुंधली दुनिया को

Photo by MontyLov on Unsplash

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